Artificial Intelligence and Human Emotions

अकेलेपन का सहारा या नया खतरा? एआई का आपके जीवन में बढ़ता दखल

बीते कुछ दिनों से डिजिटल मीडिया पर एक खबर खूब चर्चा बटोर रही है। इस खबर के मुताबिक दक्षिण कोरिया में अकेले रह रहे बुजुर्गों को अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) का साथ मिल रहा है। इस खबर के मुताबिक दक्षिण कोरिया में 78 वर्ष की एक बुजुर्ग महिला अकेली रहती हैं। इन महिला के पास एक खास एआई से चलने वाली गुड़िया है। ह्योडोल नाम की ये गुड़िया उन्हें इंसानों से भी अधिक पसंद है। ऐसा इसलिए क्योंकि वह कभी भी इन बुजुर्ग महिला समेत अन्य बुजुर्गों को तकलीफ नहीं पहुंचाती। बल्कि वह गुड़िया तो उनका स्वागत करती है। बैंग नाम की यह महिला बताती हैं कि  अगर वह कभी उदास हो जाएं तो उनके लिए गाने गाती है।

दक्षिण कोरिया में एक डॉल बनी बुजुर्गों का सहारा
दक्षिण कोरिया में एक डॉल बनी बुजुर्गों का सहारा


सिर्फ इतना ही नहीं, यह गुड़ियां बैंग को दवाई लेने की भी याद दिलाती है। यह गुड़िया बैंग से प्रेम जताती है। दिनभर उनसे बात करती है। बैंग की अपनी बेटी है लेकिन वह अलग रहती है। उससे उनकी बहुत बात हो नहीं पाती तो यह गुड़िया ही उनकी सुख-दुख की साथी बन गई है। आभासी दुनिया का यह साथ दक्षिण कोरिया की बैंग को ही पसंद नहीं आ रहा बल्कि एआई मित्र बनाने का यह चलन काफी आगे बढ़ चुका है। लोग आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस से अपने जीवन के सुख-दुख को साझा कर रहे हैं। अकेले रहने वाले या फिर तनाव से जूझ रहे लोगों के लिए एआई भावनात्मक रूप से सहारा देने वाला बन रहा है। लेकिन विशेषज्ञों का कहना है कि यह खतरनाक ट्रेंड है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जो हमारे कामों को आसान बनाने के लिए तैयार किया गया था, अब वह हमारा साथी भी बन रहा है। लेकिन यह बात काफी चिंताजनक भी है। आईआईआईएम लखनऊ की तरफ से की गई एक स्टडी में भी यह बात सामने आई है। इस स्टडी के मुताबिक लोग कुछ अधिक ही एआई पर अपनी भावनात्मक जरूरतों के लिए निर्भर होते जा रहे हैं। कनाडा में एक महिला ने चैटजीपीटी की पेरेंट कंपनी ओपनएआई को कोर्ट में घसीटा है। इस महिला का आरोप है कि उनकी बेटी ने चैटजीपीटी की वजह से आत्महत्या की।

तनहा लोगों का सहारा
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का सकारात्मक पहलू (अगर इसे सकारात्मक माना जाए) ये है कि यह अकेले रहने वाले लोगों का सहारा बन रहा है। दक्षिण अफ्रीका में बढ़ते अकेलेपन के बीच एआई आधारित गुड़िया बुजुर्गों के लिए एक नए सहारे के रूप में उभर रही हैं। ह्योडोल जैसी एआई गुड़िया उनके जीवन में एक साथी की भूमिका निभा रही हैं। यह गुड़िया न केवल बातचीत करती है बल्कि उपयोगकर्ता के साथ भावनात्मक जुड़ाव भी बनाती है। मुलायम कपड़े से बनी यह डॉल कभी-कभी खुद बातचीत शुरू करती है। इससे बुजुर्गों को ऐसा महसूस होता है कि उनके पास कोई अपना मौजूद है। कई मामलों में यह उनके मानसिक स्वास्थ्य को बेहतर बनाने और अकेलेपन को कम करने में मददगार साबित हो रही है। जिन बुजुर्गों के पास कोई नहीं है, उनके लिए यह डॉल एक दोस्त, एक सहारा और एक भावनात्मक संबल बनती जा रही है। हालांकि कुछ विशेषज्ञों को आशंका है कि इस तरह की तकनीक कहीं वास्तविक मानवीय रिश्तों को कमजोर न कर दे। 

AI and humans

एआई चैटबॉट्स से बढ़ता जोखिम
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस चैटबॉट्स को लेकर सबसे बड़ी आलोचनाओं में से एक यह है कि वे अक्सर वही कहते हैं जो उपयोगकर्ता सुनना चाहते हैं। शोधकर्ता इस प्रवृत्ति को साइकोफैंसी कहते हैं। इसमें चैटबॉट्स उपयोगकर्ता की बातों से सहमत होते हैं। उनकी तारीफ करते हैं और उनके विचारों को सही ठहराते हैं। तब भी जब वह विचार गलत, हानिकारक या अनैतिक हों। यही वजह है कि कई लोग सलाह, भावनात्मक सहारे या रिश्तों से जुड़ी समस्याओं के लिए एआई पर भरोसा करने को लेकर चिंतित रहते हैं। कई उपयोगकर्ता यह भलीभांति समझते हैं कि एआई न तो कोई चिकित्सक है, न ही भरोसेमंद सलाहकार। इसके बावजूद, शोक, तनाव, अकेलेपन या आत्म संदेह के दौर में उन्हें इस तरह का समर्थन और मान्यता अप्रत्याशित रूप से सुकून देता है। यह दर्शाता है कि एआई के साथ इंसानों का रिश्ता केवल तर्कसंगत नहीं बल्कि गहराई से भावनात्मक भी होता जा रहा है। सवाल यह उठता है कि अगर कोई सिस्टम उपयोगकर्ता को बनाए रखने के लिए डिजाइन किया गया है तो क्या वह सही समय पर उसे चुनौती दे पाएगा?

एआई की वजह से आत्महत्या ! 
कनाडा में एक मां ने ओपनएआई के खिलाफ गंभीर आरोप लगाए हैं। इस महिला ने केस दायर करते हुए कहा है कि चैटजीपीटी ने उनकी 24 साल की बेटी को आत्महत्या करने से रोकने के बजाय उसके खतरनाक विचारों को और बढ़ावा दिया। मां क्रिस्टी कैरियर के अनुसार, उनकी बेटी एलिस ने जून 2025 में अपनी जान लेने से पहले कई महीनों तक चैटजीपीटी से अपने मन की बातें साझा की थीं। इसमें उसने बार-बार आत्महत्या के विचार भी बताए। आरोप है कि इस दौरान चैटबॉट ने न तो किसी इमरजेंसी सेवा को अलर्ट किया और न ही परिवार को सूचित किया। यहां तक कि कुछ जवाबों में चैटबॉट ने ऐसे वाक्य कहे जो उसके दर्द को समझते हुए उसकी नकारात्मक सोच को चुनौती देने के बजाय मान्यता देते नजर आए। चैटबॉट ने कई बार हेल्पलाइन नंबर सुझाया लेकिन बातचीत को गंभीर खतरे के रूप में फ्लैग नहीं किया।

एलिस ने आत्महत्या की
एलिस

 

एलिस शुरुआत में तकनीकी मदद के लिए चैटजीपीटी का इस्तेमाल करती थीं लेकिन बाद में उन्होंने अपने निजी जीवन, रिश्तों और मानसिक संघर्षों के बारे में भी बात करना शुरू कर दिया। मुकदमे में यह भी आरोप लगाया गया है कि कंपनी ने अपने प्रोडक्ट को अधिक मानवीय और आकर्षक बनाने के लिए तेजी से बदलाव किए जिससे लोग उससे भावनात्मक रूप से जुड़ने लगे। ओपनएआई का कहना है कि यह एक दुखद घटना है और वे अब अपने सिस्टम को बेहतर बनाने के लिए मानसिक स्वास्थ्य विशेषज्ञों के साथ काम कर रहे हैं। यह मामला एआई की सुरक्षा, जिम्मेदारी और मानसिक स्वास्थ्य पर उसके प्रभाव को लेकर गंभीर सवाल खड़े करता है।

कंपैनियन ऐप से दोस्ती अच्छी नहीं
एआई से संचालित होने वाले कंपैनियन ऐप्स लोगों को बातचीत, सहानुभूति और भावनात्मक सहारा देने का दावा करती हैं। ये दावे इसलिए किए जाते हैं ताकि वह अकेलेपन और मानसिक तनाव से राहत पा सकें। एआई की दस्तक की वजह से दिख रहे इस बदलते ट्रेंड को लेकर भारतीय प्रबंधन संस्थान (आईआईएम), लखनऊ ने एक शोध किया। इस शोध को करने के बाद शोधकर्ताओं ने गंभीर चेतावनी दी है। शोधकर्ताओं ने कहा कि इन ऐप्स का अत्यधिक उपयोग लोगों को असली मानवीय रिश्तों से दूर कर सकता है। यह मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकता है। यह अध्ययन खास है क्योंकि इसमें बड़े पैमाने पर नैचुरल लैंग्वेज प्रोसेसिंग (एनएलपी) और कंज्यूमर सैटिस्फैक्शन मॉडलिंग का उपयोग किया गया। यह वह मॉडल होता है जिससे उपयोगकर्ताओं के व्यवहार और अनुभवों को गहराई से समझा जा सकता है।

एआई पर बढ़ रही निर्भरता
शोध में सामने आया कि बड़ी संख्या में लोग भावनात्मक सहारे के लिए एआई पर निर्भर होते जा रहे हैं। कई मामलों में यह निर्भरता इतनी बढ़ गई है कि लोगों ने वास्तविक रिश्तों की जगह एआई को प्राथमिकता देना शुरू कर दिया है। इससे सामाजिक दूरी बढ़ने और वास्तविक जीवन में बातचीत कम होने जैसे परिणाम देखने को मिले। शोधकर्ताओं ने गूगल प्ले स्टोर से 1.57 लाख से अधिक यूजर रिव्यू का विश्लेषण किया। इस विश्लेषण में सामने आया कि उपयोगकर्ताओं को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। इनमें तकनीकी खामियां, सब्सक्रिप्शन और पेवॉल से जुड़ी आर्थिक परेशानियां शामिल हैं। इसके अलावा अनुचित या असहज एआई व्यवहार, प्राइवेसी और नैतिकता से जुड़े सवाल भी हैं। ऐसे लोगों के वास्तविक सामाजिक संबंधों पर नकारात्मक प्रभाव भी देखने को मिला है। शोधकर्ताओं ने बताया है कि जो भी लोग एआई के साथ रिश्ता जोड़ देते हैं, धीरे-धीरे उनकी भावनात्मक निर्भरता एआई पर बनने लग जाती है।

टेक्नोलॉजी पैराडॉक्स
अध्ययन का एक महत्वपूर्ण निष्कर्ष टेक्नोलॉजी पैराडॉक्स भी रहा। इसमें पाया गया कि नकारात्मक अनुभवों के बावजूद उपयोगकर्ता इन ऐप्स को उच्च रेटिंग देते हैं। यह दर्शाता है कि पारंपरिक संतुष्टि के पैमाने इन प्लेटफॉर्म्स के गहरे मनोवैज्ञानिक प्रभावों को पूरी तरह नहीं समझ पाते। शोधकर्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि इन तकनीकों में उचित सुरक्षा उपाय और नैतिक मानक नहीं जोड़े गए तो इनके दीर्घकालिक प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। उन्होंने नीति निर्माताओं से अपील की कि एआई कंपैनियन ऐप्स को अलग श्रेणी में रखा जाए और उनके लिए विशेष नियम बनाए जाएं। साथ ही, डेवलपर्स को भी ऐसे फीचर्स विकसित करने की जरूरत है जो उपयोगकर्ताओं में भावनात्मक निर्भरता को बढ़ावा देने के बजाय उसे नियंत्रित करें और सुरक्षित डिजिटल अनुभव को सुनिश्चित करें।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आज इंसान के जीवन में केवल एक तकनीकी सुविधा नहीं बल्कि एक भावनात्मक साथी के रूप में प्रवेश कर चुका है। जहां एक ओर यह अकेलेपन से जूझ रहे लोगों, खासकर बुजुर्गों के लिए सहारा बन रहा है। वहीं दूसरी ओर इसके बढ़ते प्रभाव ने कई गंभीर सवाल भी खड़े कर दिए हैं। एआई पर बढ़ती भावनात्मक निर्भरता वास्तविक मानवीय रिश्तों को कमजोर कर सकती है। मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर डाल सकती है। दक्षिण कोरिया की ह्योडोल गुड़िया हो या चैटबॉट्स के साथ लोगों का जुड़ाव, ये सभी उदाहरण इस बदलते दौर की झलक दिखाते हैं। जहां इंसान और मशीन के बीच की दूरी तेजी से कम हो रही है। हालांकि, यह भी सच है कि हर तकनीक की तरह एआई का प्रभाव इस बात पर निर्भर करता है कि उसका उपयोग कैसे किया जाता है। यदि इसके साथ सही सुरक्षा उपाय, नैतिक मानक और जिम्मेदारी जोड़ी जाए तो यह एक सहायक उपकरण साबित हो सकता है। लेकिन अगर इसे बिना नियंत्रण के भावनात्मक सहारे के रूप में अपनाया गया तो इसके परिणाम खतरनाक हो सकते हैं। ऐसे में जरूरी है कि तकनीक और इंसान के बीच संतुलन बनाए रखा जाए ताकि एआई हमारा सहायक बने, विकल्प नहीं।

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