कॉकरोच जनता पार्टी: सत्ता की चाल या युवाओं का असंतोष?
साल 2015। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में रक्षा मंत्री (तब केंद्रीय गृह मंत्री) राजनाथ सिंह ने एक बयान दिया। उन्होंने कहा कि हमारा कोई भी मंत्री इस्तीफा नहीं देगा। यह एनडीए सरकार है ना कि यूपीए की। केंद्रीय रक्षा मंत्री का यह बयान वह सच था जो सत्ता में बैठी भारतीय जनता पार्टी के स्वभाव को प्रस्तुत करता है। सत्तानीत एनडीए पर और इसके मंत्रियों के खिलाफ कई बार सवाल उठाए गए। शुरू-शुरू में इस्तीफे की मांग भी की गई लेकिन कोई इस्तीफा हुआ नहीं। और आगे भी होगा, यह संभव नहीं लगता। लेकिन इसके बावजूद वर्तमान में एक आंदोलन चलाया जा रहा है। इस आंदोलन की सूत्रधार है- कॉकरोच जनता पार्टी। वह पार्टी जो एक मीम से जन्मी और सड़कों पर उतरी।
खुद को बेरोजगार और अंसतुष्ट युवाओं की प्रतिनिधि बताने वाली यह पार्टी केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा मांग रही है। नीट पेपर लीक, सीबीएसई एग्जाम में गड़बड़ी और छात्रों के भविष्य के साथ हो रहे खिलवाड़ के लिए यह पार्टी केंद्रीय शिक्षा मंत्री को जिम्मेदार मानती है। जंतर-मंतर पर पहला विरोध प्रदर्शन करने के बाद इस पार्टी के संस्थापक अभिजीत दीपके पूरे देश का भ्रमण कर रहे हैं और जगह-जगह विरोध प्रदर्शन किए जा रहे हैं। हर विरोध प्रदर्शन में एक ही आवाज उठाई जा रही है कि शिक्षा मंत्री इस्तीफा दो। लेकिन जब इस आंदोलन की बात हो रही है तो इस्तीफे से अधिक कॉकरोच जनता पार्टी की बात की जा रही है। कोई इसे सरकार समर्थित आंदोलन बता रहा है तो कोई इसे विपक्षी दलों और विदेशी फंडिंग तक जोड़ रहा है। वर्तमान में स्थिति ऐसी है कि आप किसी भी दावे को खारिज नहीं कर सकते।
सत्ता प्रायोजित आंदोलन?
कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के आंदोलन को हर कोई अपने चश्मे से देख रहा है। सरकार समर्थित लोग इसे विपक्षी और विदेशी ताकतों का एजेंडा बता रहे हैं। सवाल उठाए जा रहे हैं कि इस पार्टी की फंडिंग कहां से हो रही है? तो दूसरी तरफ, विश्लेषकों का एक धड़ा वह भी है जो इसे सत्ता प्रायोजित एजेंडे का हिस्सा मान रहा है। इस बात को साबित करने के भले ही कोई पुख्ता सबूत किसी के पास ना हों लेकिन संभावनाएं जरूर हैं। यह संभावना तब उससे खड़ी हुई है जिस तरह से पुलिस ने इसको सहमति दी। पुलिस की सहमति को कई लोग सत्ता समर्थन के नजरिए से देख रहे हैं। जिस तरह से पुलिस ने छह जून को एयरपोर्ट पर खुद आकर सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके को प्रदर्शन करने का सहमति पत्र सौंपा। जिस शांतिपूर्ण ढंग से पुलिस ने यहां पहुंचे युवाओं को आंदोलन करने दिया, उससे सवाल उठा कि कहीं खुद सरकार तो नहीं चाहती थी कि यह प्रदर्शन होने दिया जाए।
सरकार को पता था कि ये कॉकरोच (युवा) प्रदर्शन के लिए जमा होंगे। नारे लगाएंगे और फिर चले जाएंगे। जंतर-मंतर पर हुआ भी यही। सोनम वांगचुक को छोड़ दिया जाए तो कोई बड़ा प्रतिष्ठित नाम उस दिन मंच पर सीजेपी के साथ नहीं दिखा। कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन को होने देना और इस पर बहुत ज्यादा प्रतिक्रिया नहीं देने के पीछे एक उद्देश्य सरकार का यह भी हो सकता है कि वह खुद को लोकतांत्रिक दिखाना चाहती हो। बीते कुछ वक्त से सत्ता पक्ष पर कई सवाल उठाए गए हैं। इनमें कहा गया है कि यह सरकार असहमति को दबाती है। विरोध प्रदर्शन करने नहीं देती। संभव है कि इस आंदोलन को खड़ा कर वह इसी छवि को सुधारने की कोशिश कर रही हो। दुनिया को बताना चाह रही हो कि जो उस पर लोकतांत्रिक मूल्यों को दबाने का आरोप लगाते हैं, वह सब गलत हैं।
उबाल को कम करने की कोशिश
जरूरी नहीं है कि कॉकरोच जनता पार्टी का आंदोलन सरकार समर्थित हो, लेकिन उसके बावजूद यह सत्ता पक्ष के लिए गुड न्यूज हो सकता है। बीते कुछ वक्त से छात्रों के बीच आक्रोश बढ़ा है। लगातार पेपर लीक, परीक्षाओं में गड़बड़ियां और रोजगार को लेकर उठते सवालों की वजह से युवा गुस्से में हैं। सरकार जानती है कि इस गुस्से को बहुत लंबे समय तक पलने नहीं देना है। अगर यह गुस्सा बहुत देर तक पलता है तो उसके लिए बड़ी चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं। ऐसे में कॉकरोच जनता पार्टी का बनना और छात्रों के गुस्से को प्रदर्शन के रूप में बाहर लाना, उसके लिए एक अच्छी बात हुई। यह आंदोलन छात्रों के आक्रोश को कम करने का एक अवसर है। इसी वजह से सरकार इस आंदोलन को दबाने के लिए बहुत सख्त रणनीति नहीं अपना रही है। अब सत्ता पक्ष से जुड़ने और सरकार के इस आंदोलन को लेकर अपनाए जा रहे रवैए को लेकर सच जो भी हो लेकिन इतनी बात तो तय है कि यह आंदोलन धीरे-धीरे ही सही अपनी जड़ें फैला रहा है। वैसे भी हमारे देश में हमने देखा है कि अक्सर युवाओं के आंदोलन को एक तबका क्रांति घोषित कर देता है तो दूसरा, इस पर सत्ता प्रायोजित का टैग लगा देता है। हालांकि दोनों में सच क्या है, यह तब पता चलेगा जब यह आंदोलन अपने चरम पर पहुंचेगा।
कैसे बनी कॉकरोच जनता पार्टी?
क्या ये कॉकरोच (युवा) कोई बदलाव ला पाएंगे? इस सवाल का जवाब लेने से पहले महत्वपूर्ण ये जानना है कि यह पार्टी बनी कैसे? 15 मई, 2026 को भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने सुनवाई के दौरान एक मौखिक टिप्पणी की। उन्होंने कुछ युवाओं, सोशल मीडिया और आरटीआई कार्यकर्ताओं की तुलना कॉकरोच से की थी। हालांकि बाद में उन्होंने इस पर सफाई देते हुए कहा था कि उनके बयान को मीडिया ने गलत ढंग से पेश किया। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके ने बीबीसी मराठी से बात करते हुए कहा कि मैंने सीजेआई का बयान एक्स पर देखा। वह कहते हैं कि इस बयान ने मुझे गुस्से और निराशा से भर दिया। मैंने एक्स पर पूछा कि सब कॉकरोच साथ आ जाएं तो क्या होगा। दीपके बताते हैं कि उनकी इस बात पर जेन जी और युवाओं के कमाल के जवाब मिले और सबने कहा कि हमें एक प्लेटफॉर्म बना लेना चाहिए। दीपके बताते हैं कि इससे मुझे एक ऑनलाइन पैरोडी पार्टी बनाने का आइडिया मिला और इसका नाम रखा गया कॉकरोच जनता पार्टी। दीपके कहते हैं कि इस पार्टी में शामिल होने के लिए कुछ पात्रताएं तय की गईं जो सीजेआई के बयान के मुताबिक थीं। पात्रताओं में आपको आलसी होना होगा, बेरोजगार होना होगा और आप लगातार ऑनलाइन रहने वाले हों। दीपके कहते हैं कि घंटों के भीतर ही हजारों लोग खुद को इस पर रजिस्टर्ड करने लगे। इससे हमें लगा कि यह सिर्फ एक मजाक नहीं रह गया है। हमने एक वेबसाइट बनाई। पार्टी का घोषणापत्र बनाया। इस तरह हमने ऑनलाइन खड़े हुए इस आंदोलन को जमीन पर लाने का फैसला किया।

कॉकरोच ला पाएंगे बदलाव?
एक मीम से आंदोलन की शक्ल लेने वाले ये कॉकरोच क्या कोई बदलाव ला पाएंगे? जवाब में अभी हां या ना, दोनों ही नहीं कहा जा सकता है। हालांकि इतना जरूर है कि इस पैरोडी पार्टी ने युवाओं को एक मंच और एक आवाज देने काम जरूर किया है। कई लोग कॉकरोच जनता पार्टी के आंदोलन की तुलना अन्ना हजारे के आंदोलन से कर रहे हैं। लेकिन यह तुलना करने वालों को समय का बदलाव समझना होगा। जब अन्ना हजारे का आंदोलन शुरू हुआ था, तब सत्ता में एक ऐसी सरकार थी जो आलोचनाओं पर एक्शन लेती थी। उस सरकार में विपक्ष ने आवाज उठाई नहीं कि मुख्यमंत्रियों तक के इस्तीफे हो गए। लेकिन वर्तमान सरकार मंत्रियों के इस्तीफे लेने में विश्वास नहीं रखती है। मौजूदा सत्तापक्ष पर यह आरोप भी लगते हैं कि वह आंदोलनों को दबाना जानती है। सीजेपी के आंदोलन को अन्ना आंदोलन के समकक्ष इसलिए भी नहीं रखा जा सकता क्योंकि उस आंदोलन को करने के लिए एक पूरा सिस्टम तैयार किया गया था। आंदोलन करने वालों में समाज के प्रतिष्ठित शख्सियतें शामिल थीं। इन लोगों ने पूरी एक व्यवस्था के तहत उस आंदोलन को चलाया। लेकिन कॉकरोच जनता पार्टी के बारे में यह अभी नहीं कहा जा सकता है। अभी सीजेपी का यह आंदोलन सोशल मीडिया से उठा हुआ महसूस होता है। एक ऐसा आंदोलन जिसके पास अनुभव ही नहीं बल्कि स्पष्ट विजन की भी कमी है।
धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा देंगे?
आखिर में सवाल वहीं पर खड़ा हो जाता है जहां से हमने शुरुआत की थी। क्या धर्मेंद्र प्रधान इस्तीफा देंगे? जवाब है- संभावना कम है। कॉकरोच जनता पार्टी ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को ही अपना प्रमुख मुद्दा बनाया है। इससे इनके आंदोलन की सफलता और विफलता इसी से तय होगी कि प्रधान इस्तीफा देते हैं या नहीं। जेन जी के इस आंदोलन की सफलता इसी पर टिकी है कि या तो प्रधान इस्तीफा दें या फिर सरकार कोई ऐसा फैसला ले जो सीजेपी की मांगों के अनुरूप हो। लेकिन क्या ऐसा होगा? वर्तमान सत्ता पक्ष का इतिहास देखें तो यह सरकार जल्द किसी भी आंदोलन के सामने झुकने वाला रवैया नहीं अपनाती है। इस सरकार के रवैए से ऐसा लगता है कि अगर विपक्ष और आंदोलनकारियों की सुन ली तो अपनी गलती स्वीकार करना है। यह सरकार गलतियां स्वीकार करने में विश्वास नहीं करती है।
अब देखना होगा कि ये कॉकरोच वह कर दिखाते हैं (मंत्री का इस्तीफा) जो इस सरकार के रहते कोई भी नहीं कर पाया है या फिर यह आंदोलन भी एक सोशल मीडिया ट्रेंड की तरह फीड से गायब हो जाता है। समय के साथ ही इन सवालों के जवाब भी मिल जाएंगे कि इस आंदोलन को आखिर कौन पोषित कर रहा है? – सरकार, विपक्ष या फिर युवा। तब तक कॉकरोचों की आंदोलन वाली टाइमलाइन को फॉलो करते रहिए, क्या पता यह आंदोलन कुछ ऐतिहासिक कर जाए।











