जसपाल राणा

उत्तराखंड का गौरव बंदूक्या जसपाल राणा नहीं रहे

देश के प्रतिष्ठित निशानेबाज और कोट रहे जसपाल राणा का शुक्रवार को निधन हो गया है। जसपाल राणा लंबे समय से बीमारी से जूझ रहे थे। बताया जा रहा है कि जसपाल राणा जर्मनी में थे। जब वह वहां से लौटे तो उनकी तबीयत अचानक बिगड़ गई और उन्हें अस्पताल में भर्ती कराया गया। जहां 49 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया। हालांकि उनके निधन की असली वजह क्या रही, इसका अभी खुलासा नहीं हुआ है। हालांकि हार्ट अटैक की आशंका जताई जा रही है।

एनडीटीवी ने भारतीय राष्ट्रीय राइफल संघ के एक सूत्र को हवाले से लिखा है कि जसपाल को विमान में अच्छा महसूस नहीं हो रहा था और दिल्ली पहुंचने के बाद वह सीधे अस्पताल गए जहां टेस्ट के बाद उन्हें एक स्टेंट डाला गया। हाल ही में जसपाल राणा की सर्जरी भी हुई थी। उनका निधन दिल्ली के मैक्स अस्पताल में हुआ।

जसपाल राणा उत्तराखंड से निकले प्रतिष्ठित निशानेबाज थे। राणा ने एशियाई खेलों में स्वर्ण पदक जीता था। जसपाल राणा एक कामयाब कोच भी रहे। उन्होंने ओलंपिक में दो बार पदक जीत चुकीं स्टार निशानेबाज मनु भाकर को कोचिंग दी थी।

जसपाल राणा के निधन पर केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने भी शोक व्यक्त किया है। उन्होंने लिखा कि अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शूटर जसपाल राणा के आकस्मिक निधन से मैं स्तब्ध और शोकाकुल हूँ। जसपाल एक उत्कृष्ट खिलाड़ी और कोच होने के साथ-साथ अत्यंत सहज, सरल और बहुत ही नेकदिल इंसान थे। भारत में शूटिंग को एक खेल के रूप में लोकप्रिय बनाने में उनकी बड़ी प्रभावी भूमिका थी।

जसपाल राणा पर राजनाथ सिंह का ट्वीट
जसपाल राणा पर राजनाथ सिंह का ट्वीट

वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप एवं एशियन गेम्स में भारत को गोल्ड मेडल दिला कर भारत का नाम पूरे विश्व में रोशन किया। उनके निधन से भारतीय खेल जगत को एक बड़ी क्षति हुई है। ईश्वर उनके शोक-संतप्त परिजनों को इस पीड़ा को सहने की शक्ति प्रदान करें। इस कठिन समय में उनके परिवार और प्रसशंकों के प्रति मैं अपनी हार्दिक संवेदना व्यक्त करता हूँ। ओम शांति!

जसपाल राणा का जन्म 1976 में हुआ था। राणा ने एशियाई खेलों और राष्ट्रमंडल खेलों सहित कई अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भाग लिया और कई मेडल अपने नाम किए। भारत को शूटिंग खेल में मजबूत पहचान दिलाने में उनका महत्वपूर्ण योगदान माना जाता है। जसपाल राणा ने राष्ट्रमंडल खेलों के चार संस्करणों (1994, 1998, 2002 और 2006) में कुल 15 मेडल जीते। इसमें जहां 9 गोल्ड मेडल शामिल थे तो वहीं, 4 सिल्वर और 2 ब्रॉन्ज भी शामिल रहे।

जसपाल राणा के शानदार प्रदर्शन के लिए उन्हें 1994 में अर्जुन पुरस्कार से नवाजा गया। इसके बाद 1997 में उन्हें पद्मश्री से भी सम्मानित किया गया था। 2020 में उन्हें द्रोणाचार्य पुरस्कार से भी सम्मानित किया गया। राणा ने भारतीय शूटर मनु भाकर को भी कोचिंद दी। राणा की ही कोचिंग और अनुभव का नतीजा था कि भाकर ने 2024 पेरिस ओलंपिक में दो बॉन्ज मेडल अपने नाम किए।

उत्तराखंड का लाल
जसपाल राणा का जन्म एक किसान परिवार में उत्तरकाशी में हुआ। उनके पिता नारायण सिंह ITBP में थे। वहीं, उनकी मां एक हाउसवाइफ थीं। जसपाल की पढ़ाई मसूरी और दिल्ली में हुई। 1994 में जसपाल तब पहली बार चर्चा में आए जब उन्होंने स्टैंडर्ड पिस्टल इवेंट में जूनियर वर्ल्ड रिकॉर्ड परफॉर्मेंस को मैच किया। यह गेम मिलान में हुआ था।  नारायण राणा ने अपने बेटे जसपाल को महज 10 साल की उम्र में ही पिस्तल से रूबरू करा दिया था। राणा को पिस्तल और राइफल दोनों में ही महारत हासिल थी लेकिन बाद में फेडरेशन ने सिर्फ एक ही खेल को चुनने का नियम लाया। जब यह नियम लाया गया तो जसपाल ने पिस्तल को चुना। राणा इस खेल में इतने माहिर हो गए थे कि 11-12 साल की उम्र तक वह स्टेट और नेशनल लेवल के कॉम्पिटीशन में हिस्सा लेने लगे। 1988 का साल था जब उन्होंने सिर्फ 12 साल की उम्र में अहमदाबाद में हुए 31वें नेशनल शूटिंग चैंपियनशिप में भाग लिया। यहां उन्होंने सिल्वर मेडल अपने नाम किया। यहां से फिर उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा और वह सीनियर गेम की तरफ बढ़ चले।

जब अस्पताल से भाग पड़े राणा

बात 1994 की है। मिलान में वर्ल्ड शूटिंग चैंपियनशिप के एक दिन पहले जसपाल राणा अस्पताल में थे। उनके पैर में एक फोड़ा हो गया था। डॉक्टर ने कहा कि सर्जरी करनी पड़ेगी लेकिन अगर सर्जरी करते तो गेम खेलना मुश्किल हो जाता। क्योंकि डॉक्टर ने कहा था कि अस्पताल से छुट्टी नहीं दी जाएगी। डॉक्टर का इतना कहना था कि राणा ने अपने कोच सनी थॉमस के साथ अस्पताल से भागने का प्लान बनाया। जसपाल समय मिलते ही अस्पताल से भाग गए। वह भाग तो गए थे लेकिन उनकी परीक्षा अभी बाकी थी। रात को फोड़ा फूट गया और इससे उन्हें भयानक दर्द होने लगा। इतना ज्यादा कि वह अपनी जींस पैन्ट भी नहीं उतार पा रहे थे। उन्होंने पेन किलर भी नहीं लिया। सिर्फ इसलिए क्योंकि उन्हें आशंका थी कि कहीं ये डोपिंग में ना आ जाए। आखिर में उन्होंने अपनी जीन्स को फाड़कर हाफ पैंट में बदल दिया। सुबह वह उस हाफ पैंट में ही उस दर्द के साथ जूनियर सेक्शन में वर्ल्ड रिकॉर्ड स्कोर के साथ ही पहला इंटरनेशनल गोल्ड मेडल जीतकर ही लौटे।

इसी साल हिरोशिमा में एशियन गेम्स हुए। यहां पर भी उन्होंने गोल्ड मेडल अपने नाम किया। खेल में उनके इस अद्भुत प्रदर्शन का ही नतीजा था कि उन्होंने 18 साल की उम्र में ही अर्जुन अवॉर्ड अपने नाम किया। जसपाल राणा ने कॉमनवेल्थ गेम्स के इतिहास में कुल 15 मेडल अपने नाम किए जो भारतीय खिलाड़ी का अपनेआप में एक रिकॉर्ड है।जसपाल ने 1990 से 2000 के बीच शूटिंग सर्किट में कमाल कर रे खा। उन्होंने इस दौरान 09 गोल्ड, चार सिल्वर,  और दो ब्रॉन्ज मेडल अपने नाम किए।


कॉमनवेल्थ गेम्स 1994 में कोलंबिया में हुआ। इस गेम में राणा ने चार मेडल पर अपना कब्जा जमा लिया। 10 मीटर एयर पिस्टल मेन्स डेब्यू के दौरान उन्होंने सिल्वर मेडल जीता। इसके बाद 10 मीटर एयर पिस्टल के पेयर्स इवेंट में ब्रॉन्ज अपने नाम किया। सेंटर फायर पिस्टल मेन्स इवेंट में दो गोल्ड मेडल और जीत लिए।

1998 का कॉमनवेल्थ गेम्स मलेशिया के क्वालालंपुर में हुआ। यहां एक बार फिर उन्होंने 10 मीटर एयर पिस्टल मेन्स इवेंट में सिल्वर जीता। 10 मीटर एयर पिस्टल पेयर्स इवेंट में एक और सिल्वर जीता। सेंटर फायल पिस्टल मेन्स और सेंटर फायर पिस्टल पेयर्स इवेंट में दोनों में गोल्ड मेडल जीता। 


2000 के कॉमनवेल्थ गेम्स में वह भारतीय दल के साथ मैनचेस्टर पहुंचे। 10 मीटर एयर पिस्टल में ब्रॉन्ज अपने नाम किया। 10m. पेयर्स इवेंट में सिल्वर, 25 मीटर स्टैंडर्ड मेन्स इवेंट में गोल्ड, 25 मीटर स्टैंडर्ड मेन्स पेयर्स इवेंट में एक और गोल्ड अपने नाम किया। इसके बाद उन्होंने सेंटर फायर पिस्टल मेन्स और सेंटर फायल पिस्टल मेन्स पेयर्स इवेंट में दो और गोल्ड मेडल अने नाम किए।

2006 में हुए कॉमनवेल्थ गेम्स में भी उनका जादू चला। अपने करियर के आखिरी कॉमन वेल्थ गेम्स में जसपाल राणा ने सेंटर फायर पिस्टल मेन्स पेयर्स इवेंट में गोल्ड मेडल अपने नाम किया।

ओलंपिक मेडल क्यों नहीं?
जिस समय जसपाल राणा खेल रहे थे, उस समय ओलंपिक इवेंट इस खेल के लिए नहीं हुआ करते थे। इसलिए जसपाल ओलंपिक इवेंट में नहीं जा पाए। वर्ल्ड चैंपिंयनशिप और एशियन गेम्स में भी जसपाल ने कमाल दिखाया।

जब नेगी दा ने लिखा गीत

90 के दशक में जब जसपाल राणा लगातार मेडल अपने नाम कर रहे थे, तब नरेंद्र सिंह नेगी ने भी उन पर एक गीत लिखा था। गीत का शीर्षक था- बंदूक्य जसपाल राणा सिस्त साधी दे… उत्तराखंड मां बाग लग्यूं, ये बाग मारी दे। नरेंद्र सिंह नेगी बताते हैं कि उन्हें इस गीत को लिखने की प्रेरणा एक होटल में बैठे हुए मिली। उन्होंने बताया कि गांव की एक बूढ़ी महिला टीवी पर जसपाल राणा को खेल में निशाना साधते हुए देख रही थी।  जब जसपाल राणा ने निशाना साधा तो बूढ़ी महिला ने कहा कि अगर तू इतना ही बड़ा निशानेबाज है तो उत्तराखंड में लगे बाघ को मार दे। बूढ़ी महिला ने भले ही टीवी पर दिख रहे राणा के लिए यह बात कही थी लेकिन नेगी दा ने इसे गीत में पिरो दिया। और यह गीत अपने समय का काफी बड़ा हिट गीत साबित हुआ।

 

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